A Literary Reading of Biraj Bahu -Sarat Chandra’s Book
इस literary blog में हम author शरत चंद्र चट्टोपाध्याय (Sarat Chandra Chattopadhyay) और उनके novel बिराज बहु (Biraj Bahu) पर बात करेंगे। एक ऐसा novel जिसे आगे चलकर इसी नाम से film के लिए भी adapt किया गया, जिसे National award और कई सारे Filmfare awards से सम्मानित किया गया। और Cannes Film Festival में Palme d’Or के लिए nominate भी किया गया।
शरत चंद्र एक ऐसे author थे की जो अपनी ही कहानियों को लेकर self-doubt से भरे हुए थे। इसलिए अपने career की शुरुआत में उन्होंने ‘अनिला देवी’ और ‘अनुपमा’ नाम से लिखना शुरू किया, सिर्फ़ ये देखने के लिए कि दुनिया उनकी कहानियों को कैसे receive करती है।
शरत चंद्र एक genius author थे जिन्होंने अपनी writing के through society में फैले injustice और regressive norms को expose किया और women’s rights और dignity को एक नयी आवाज़ दी। अपने दौर के वो एक ऐसे writer थे जिन्होंने sensitivity, realism और social awareness को एक साथ जोड़ा, और हमें एक modern और progressive ‘कल’ के लिए सोचने पर मजबूर किया।
एक ऐसे लेखक, जिनकी कहानियाँ वक़्त के साथ पुरानी नहीं हुईं, बल्कि आज भी relevant लगती है, और शायद इसी वजह से उनकी कई कहानियों ने Bollywood और regional cinema को deeply inspire किया। इस literary blog में हम बात करेंगे 1914 में published शरत चंद्र के एक iconic novel ‘बिराज बहु (Biraj Bahu) की।
कहानी बिराज की है, जो की एक सुंदर लेकिन बेहद स्वाभिमानी लड़की है। उसकी शादी गरीब ब्राह्मण नीलाम्बर से होती है, जो weak-natured और indecisive है। Joint family, debt, unemployment और भाई पीताम्बर की selfishness इनकी ज़िंदगी को और कठिन बना देती है। बिराज एक ऐसी भारतीय स्त्री जिसने तमाम संघर्षो के बीच भी अपने पति का साथ दिया, परन्तु जब उसका पति उसकी पतिव्रता पर ही शक कर बैठता है, तो बिराज घर छोड़ देती है। अंत में जब दोनों मिलते हैं, तब बहुत देर हो चुकी होती है, बीमार बिराज अपने पति के चरणों में अंतिम सांस लेती है।
एक ऐसी society जहाँ marriage, poverty और patriarchy मिलकर एक औरत की पहचान तय करते है, वहाँ बिराज एक ऐसी औरत है जो dignity के साथ सब कुछ झेलती है। यह कहानी सिर्फ़ पति-पत्नी के रिश्ते की नहीं, बल्कि उस moral test की भी है, जहाँ एक औरत को बार-बार खुद को साबित करना पड़ता है, जबकि पुरुष की कमजोरी और शक चुपचाप normalise कर दिए जाते हैं।
आज बिराज बहु को Indian literature की उन रचनाओं में गिना जाता है, जो marriage, loyalty और patriarchy को बिना romanticize किए expose करती हैं। इसकी relevance हमें मिर्च-मसाला (Mirch-Masala -1987) की resistance, अस्तित्व (Astitva – 2000) की self-identity, कभी अलविदा ना कहना (Kabhi Alvida Naa Kehna – 2006) की fractured marriages, हम तुम्हारे है सनम (Hum Tumhare Hain Sanam – 2002) और आप की क़सम (Aap ki kasam 1974) के mistrust में साफ़ दिखाई देती है।
‘बिराज बहु’ शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की उन novel में से है जो बताता है कि गरीबी, एक कमजोर पति और टूटती joint family के बीच खड़ी एक औरत किस तरह अपनी self-respect की क़ीमत चुकाती है।
“नशाखोर सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है।
मगर अपनी बुद्धि भ्रष्ट हो जाने की बात नहीं बर्दाश्त कर सकता।”
— शरत चंद्र चट्टोपाध्याय
आख़िर वो क्या बातें हैं जो इस novel को एक undying literary phenomenon बनाती हैं?
- क्या self-respect एक औरत की सबसे बड़ी पूँजी है?
- क्या marriage में loyalty हमेशा justice पाती है?
- क्या male flaws और selfishness भी कारण है joint family के टूटने के?
- क्या औरत का सुंदर होना भी उसका ही दोष है?”
- क्या silence भी resistance बन सकता है?
- क्या पैसे की वजह से sacrifice करने वाला ही सबसे ज़्यादा punish होता है?
इसे जानने और महसूस करने के लिए पढ़िए हमारा Premium Literary Blog जो एक evocative नज़र डालता है author की ज़िंदगी पर, novel की emotional soul पर, और कैसे यह timeless literary gem बन गयी Indian cinema की सबसे powerful फ़िल्मों में से एक।
Purchase the Book
Read the Book. Watch the Movie. Because this is where it all began.
हमें उमीद है कि आपने यह किताब पढ़ी होगी, तो comment box में share करे वो क्या बातें है जो आपकी नज़र में इस novel को iconic बनाती है।
